व्यक्तित्व का अंग्रेजी अनुवाद "Personality" है जो लैटिन शब्द परसोना से बना है जिसका अर्थ नकाब होता है और जिसे नायक नाटक करते वक्त पहनते हैं। इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखते हुए व्यक्तित्व को बाहरी वेशभूषा तथा । दिखावे के आधार पर परिभाषित किया गया है। जिस व्यक्ति का बाहरी दिखाना भड़कीला होता था , उसका व्यक्तित्व उतना ही अच्छा समझा जाता था तथा जिस व्यक्तित्व का बाहरी दिखावा साधारण होता था, उसका व्यक्तित्व उतना अच्छा नही समझा जाता था। परन्तु ऐसी परिभाषाओं को अवैज्ञानिक घोषित किया और उसके बाद धीरे-धीरे एक-एक करके विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व की अनेक परिभाषाएं दी। ऐसी परिभाषाओ की संख्या 49 थी। जिनका विश्लेषण करने के बाद आल्पोर्ट ने 1937 में 50 वी परिभाषा दी जो आज भी मान्य हैं।
आल्पोर्ट के अनुसार " व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोशारीरिक तंत्रो का गतिशील या गत्याामक संगठन है जो वातावरण में उसके अपूर्व समायोजन को निर्धारित करते है।"
आइेजेन्क के अनुसार 1952 -" व्यक्तित्व व्यक्ति के चरित्र, चित्रप्रकृति ज्ञान शक्ति तथा शरीर गठन का करीब-करीब एक स्थानीय एवं टिकाऊ संगठन है जो वातावरण में उसके अपूर्ण समायोजन का निर्धारण करता है।"
विभिन्न परिभाषा ओं का एक संयुक्त विश्लेषण करने पर व्यक्तित्व का अर्थ अधिक स्पष्ट हो जाता है। इसका एक संयुक्त विश्लेषण इस प्रकार है--
1.मनोशारीरिक तंत्र (psychophysical system)-- व्यक्तित्व एक ऐसा तंत्र है जिसके मानसिक तथा शारीरिक दोनों ही पक्ष होते हैं। यह तंत्र ऐसे तत्वों का एक गठन होता है जो आपस में अंतः क्रिया करते हैं। इस तंत्र के मुख्य तत्व शीलगुण, संवेग आदत, ज्ञान शक्ति, चित प्रकृति ,चरित्र अभीप्रेरक आदि है जो सभी मानसिक गुण हैं परंतु इन सब का आधार शारीरिक अर्थात व्यक्ति के ग्रंथिय प्रक्रियाएं हैं एवं तंत्रिकीय प्रक्रियाएं हैं । इसका स्पष्ट मतलब यह हुआ कि व्यक्ति न तो पूर्णत मानसिक है और न पूर्णतः शारीरिक ही होता है । व्यक्तित्व इन दोनों तरह के पक्षों का मिश्रण है।
2. गत्यात्मक संगठन (dynamic organisation)-- गत्यात्मक संगठन से तात्पर्य यह होता है की मनोशारीरिक तंत्र के भिन्न-भिन्न तत्व जैसे शीलगुण, आदत आदि एक दूसरे से इस तरह से संबंधित होकर संगठित है कि उन्हें एक दूसरे से पूर्णतया अलग नहीं किया जा सकता है। इस संगठन में परिवर्तन संभव है। यही कारण है कि इसे गत्यात्मक संगठन कहा गया है। इस तरह से गत्यात्मक संगठन से स्पष्ट यह है कि व्यक्तित्व के शीलगुण या अन्य तत्वों आपस में इस तरह से संगठित होते हैं कि उनमें परिवर्तन भी होते रहते हैं। उदाहरण स्वरूप , कोई व्यक्ति नौकरी आने से पहले ईमानदार ,उत्तरदायी तथा समयानिष्ट हो सकता है परंतु नौकरी मिलने के कुछ वर्षों बाद उसमें उत्तरदायित्व तथा समय निष्ठा शील गुण ज्यों- का- त्यों हो सकता है परंतु संभव है कि उसमें इमानदारी का गुण बदलकर बेईमानी का गुण विकसित हो जाए। इस उदाहरण में पहले के 3 गुणों के संगठन मैं नौकरी मिलने के बाद एक परिवर्तन दिखाया गया है ऐसा भी संभव है कि इन तीनों शील गुणों का संगठन नौकरी मिलने के बाद पूर्णतया बदल जाए। शील गुणों के संगठन में इस तरह का परिवर्तन गत्यात्मक संगठन का उदाहरण है। इस तरह के संगठन में भी वि संगठन भी सम्मिलित होता है जिसके, सहारे असामान्य व्यवहार की व्याख्या होती है । दूसरे शब्दों में, यदि किसी व्यक्ति के शील गुणों के संगठन में इस ढंग का परिवर्तन आ जाता है कि उसका व्यवहार वि संगठित हो जाता है तथा जिसके फलस्वरूप वह असामान्य व्यवहार अधिक करने लग जाता है तो इससे भी एक गत्यात्मक संगठन की श्रेणी रखेंगे।
3. संगतता(consitency)-- व्यक्तित्व में व्यक्ति का व्यवहार एक समय से दूसरे समय में संगत होता है। संगतता से मतलब यह होता है कि व्यक्ति का व्यवहार दो विभिन्न अवसरों पर लगभग एक समान होता है। इस कार पर चाइल्ड के परिभाषा में प्रत्यक्ष रूप से बल डाला गया है। व्यक्ति के व्यवहार में इसी संगतता के आधार पर उसमें अमुक शीलगुण के होने का अनुमान लगाया जाता है ।
4. वातावरण में अपूर्व समायोजन का निर्धारण( determination of unique adjustment to environment)-- प्रत्येक व्यक्ति में मनोशारीरिक गुणों का एक ऐसा गत्यात्मक संगठन पाया जाता है कि उसका व्यवहार वातावरण में अपने अपने ढंग का अपूर्व होता है। वातावरण समान होने पर भी प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार, विचार, होने वाला संवेग आदि अपूर्व होता है जिसके कारण उस वातावरण के साथ समायोजन करने का ढंग भी प्रत्येक व्यक्ति में अलग अलग होता है।
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