स्वरूप ( Nature)-समाज मनोवैज्ञानिकों ने एक मूलभूत प्रसन्न में दिलचस्पी दिखाना प्रारंभ किया है- व्यक्ति अपने आपको किस तरह जान पाता है तथा समझ पाता है?जिस प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति अपने आपको समझ पाता है या अपने बारे में ज्ञान प्राप्त कर पाता है, उसे आत्म-प्रत्यक्षण कहा जाता है। सामान्यत: व्यक्ति अपने व्यवहारों, भावो आदि का प्रत्यक्षण अपने स्पष्ट क्रियाओं का प्रेक्षण करके करता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति अपने अंगों का प्रत्यक्षण कर यह अनुमान लगाता है कि वह पहले से अधिक गोरा तथा मोटा हो गया है, तो यह आत्म - प्रत्यक्षण का उदाहरण होगा। बेरान तथा बर्न (1987) ने आत्म- प्रत्यक्षण को इस प्रकार परिभाषित किया है "जिस प्रक्रिया के द्वारा हम लोगों अपने भाव,शील गुणों तथा अभिप्रेरको को समझते हैं,उसे आत्म-प्रत्यक्षण कहा जाता है। हम लोग अपने स्पष्ट व्यवहार के प्रेक्षण के आधार पर अनुमान लगाते हैं।" यदि हम इस परिभाषा का विश्लेषण करें, तो आत्म- प्रत्यक्षण के स्वरूप के बारे में निम्नांकित तथ्य प्राप्त होते हैं -

1. आत्म-प्रत्यक्षण एक मानसिक प्रक्रिया जिसमें आत्म गुणा- रोपण की विशेषता होती है। 2. आत्म- प्रत्यक्षण की प्रक्रिया में व्यक्ति अपने भावों, शील गुणों एव अभिप्रेरको को समझने की कोशिश करता है। 3. आत्मा -प्रत्यक्षण का आधार व्यक्ति द्वारा किए गए स्पष्ट व्यवहारों का प्रेक्षण होता है।
बेम द्वारा प्रतिपादित आत्म-प्रत्यक्षण का सिद्धात।
बेम (1972)नए आत्म- प्रत्यक्षण का एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया है जो अपने आप में काफी लोकप्रिय महत्वपूर्ण हुआ। इस सिद्धांत का सार भूतत्व यह है कि हम लोग अपने मनोवृति ,भाव एंव संवेगो को सीधे नहीं समझते बल्कि इनके बारे में अपने व्यवहारों को प्रेक्षण के आधार पर अनुमान लगाते हैं । बेम का मत है कि व्यक्ति अपने आप में ठीक उसी तरह से अनुमान लगाता जैसे दूसरों के बारे में अनुमान लगाता है । परिणामत: वे प्रक्रियाए जिसके सहारे व्यक्ति अपने आप को समझता है, उन प्रक्रियाओं के समान है जिसके सहारे व्यक्ति दूसरों को जानता था समझता है। बेम का मत है कि व्यक्ति अपने मनोवृति भाव एवं संवेगो को अपने व्यवहारों के प्रेक्षण के आधार पर उस परिस्थिति में अधिक समझता है जहां उसे संबंधित आंतरिक संकेत अस्पष्ट होते हैं ।दूसरे शब्दों में जहां ऐसे आंतरिक संकेत स्पष्ट होते हैं, वहाँ व्यक्ति मनोवृति , भाव , संवेग आदि को प्रत्यक्षत:समझ लेता है न कि उसे अपने व्यवहारों के प्रेक्षण से प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर समझना पड़ता है। जैसे- यदि हम किसी व्यक्ति को तीव्र रूप से घृणा करते हैं ,तो हम इससे संबंधित भाव को इस व्यवहार के प्रेक्षण के आधार पर नहीं जानते हैं कि हमे उसके साथ कहीं जाना पसंद नहीं है । बल्कि संबंधित भाव का ज्ञान प्रत्यक्षत: हो जाता है ।ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस उदाहरण में घृणा से संबंधित आंतरिकसंकेत स्पष्ट है।
वेब का सिद्धात का समर्थन अनौपचारिक प्रेक्षणो तथा प्रयोगात्मक शोध दोनों से होता है । अनौपचारिक प्रेक्षण को एक उदाहरण इस प्रकार दिया जा सकता है ।कभी-कभी ऐसा होता है कि व्यक्ति अपना खाना खाने बैठता है तो उसे महसूस होता है कि भूख तो नहीं है । परंतु खाना खाने लगे तो बहुत खा गए। इस उदाहरण में व्यक्ति को अपने आंतरिक अवस्था का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं था।फुल शोरूम खाना खाने जैसे स्पष्ट व्यवहार के प्रेक्षण से भूख की स्थिति को समझनेे में मदद मिली । किसलर,कोलिंस तथा मिलर ने अपने प्रयोगात्मक अध्ययन के आधार पर इस सिद्वात को समर्थन प्रदान किया है । इनके प्रयोगात्मक अध्ययन के आधार पर इस सिद्धात को प्रदान किया है। इनके प्रयोगात्मक अध्ययन के आधार पर यह देखा गया है कि जब व्यक्ति अपनी मनोवृति के अनुकूल व्यवहार करता है, तो उसे अपने इस व्यवहार में पहले से अधिक विश्वास उत्पन्न हो जाता है।
बेम के आत्म-प्रत्यक्षण सिद्धांत द्वारा आंतरिक अभिप्रेरण से संबंधित तथ्यों को समझने में काफी मदद मिली । जब व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा से मात्र आनंद प्राप्त करने के लिए करता है ,तो इस तरह के अभिप्रेरण को आंतरिक अभिप्रेरण कहा जाता है , परंतु जब व्यक्ति किसी कार्य या व्यवहार को किसी बाह्य पुरस्कार प्राप्त करने के ख्याल से करता है , तो इस तरह के अभिप्रेरण को बाह्य अभिप्रेरण कहा जाता है । बेम के अनुसार किसी व्यवहार को करने के बाद जब उसे बाह्य पुरस्कार मिलता पुरस्कार है, तो इससे इस कार्य को करने के पीछे छिपे आंतरिक अभिप्रेरण में कमी आ जाती है। इस तरह के प्रभाव को अति तार्किकरण प्रभाव कहा जाता है ,इस तरह के अतितार्किकरण प्रभाव का समर्थन डेसी तथा लीपर एवं ग्रीनी आदि के द्वारा किए गए प्रयोगों में हुआ है। इन अध्ययनों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया कि जब प्रयोज्यों को कोई ऐसा करने के लिए जिसे करने में उसे प्रारंभ में आनंद आता था । बाह्य पुरस्कार दिया गया ,तो ऐसे व्यक्ति को इन कार्यों को करने में अभिरुचि कम देखी गयी तथा उनके निष्पादन में कमी आ गयी । कुछ प्रयोगात्मक सबूतों सेयह भी पता चलता है कि इस तरह का प्रभाव उस परिस्थिति में अधिक होता है जिसके बारे में बेम का यह सिद्धांत पूर्व कथन कर चुका है अर्थात उस परिस्थिति में अधिक होता है जब किए गए कार्य से संबंधित आंतरिक संकेत अस्पष्ट होते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि बाह्य पुरस्कार देने से किए जाने वाले कार्य से आनंद प्राप्त तथा अभिरुचि में जो कमी आती है ,उसका कारण क्या है? इसकी दो व्याख्याए प्रदान की गयी है -
1.किसी व्यवहार या कार्य करने के बाद बाह्य पुरस्कार मिलने से व्यक्ति है समझने लगता है कि वह कार्य मात्र बाह्य पुरस्कार की प्राप्ति के लिए कर रहा है । फलत: उस कार्य को करने में पहले से समान आनंद या अभिरुचि नहीं रह जाता है।
2.किसी व्यवहार या कार्य करने के बाद बाह्य पुरस्कार या कार्य करने के बाद बाह्य पुरस्कार मिलने से उस कार्य से आनंद या पुरस्कार में इसलिए कमी आ जाती है क्योंकि व्यक्ति है सोचता है कि उसे कार्य करने के लिए घूस जा रहा है यह उस पर दबाव डाला जा रहा है इस तरह से व्यक्ति में एक तरह से नकारात्मक - प्रभाव उत्पन्न हो जाता है । प्रेटी तथा सेलिगमैन ने अपने अध्ययन के आधार पर इस तथ्य की संपुष्टि भी किया है।
1. आत्म-प्रत्यक्षण एक मानसिक प्रक्रिया जिसमें आत्म गुणा- रोपण की विशेषता होती है। 2. आत्म- प्रत्यक्षण की प्रक्रिया में व्यक्ति अपने भावों, शील गुणों एव अभिप्रेरको को समझने की कोशिश करता है। 3. आत्मा -प्रत्यक्षण का आधार व्यक्ति द्वारा किए गए स्पष्ट व्यवहारों का प्रेक्षण होता है।
बेम द्वारा प्रतिपादित आत्म-प्रत्यक्षण का सिद्धात।
बेम (1972)नए आत्म- प्रत्यक्षण का एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया है जो अपने आप में काफी लोकप्रिय महत्वपूर्ण हुआ। इस सिद्धांत का सार भूतत्व यह है कि हम लोग अपने मनोवृति ,भाव एंव संवेगो को सीधे नहीं समझते बल्कि इनके बारे में अपने व्यवहारों को प्रेक्षण के आधार पर अनुमान लगाते हैं । बेम का मत है कि व्यक्ति अपने आप में ठीक उसी तरह से अनुमान लगाता जैसे दूसरों के बारे में अनुमान लगाता है । परिणामत: वे प्रक्रियाए जिसके सहारे व्यक्ति अपने आप को समझता है, उन प्रक्रियाओं के समान है जिसके सहारे व्यक्ति दूसरों को जानता था समझता है। बेम का मत है कि व्यक्ति अपने मनोवृति भाव एवं संवेगो को अपने व्यवहारों के प्रेक्षण के आधार पर उस परिस्थिति में अधिक समझता है जहां उसे संबंधित आंतरिक संकेत अस्पष्ट होते हैं ।दूसरे शब्दों में जहां ऐसे आंतरिक संकेत स्पष्ट होते हैं, वहाँ व्यक्ति मनोवृति , भाव , संवेग आदि को प्रत्यक्षत:समझ लेता है न कि उसे अपने व्यवहारों के प्रेक्षण से प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर समझना पड़ता है। जैसे- यदि हम किसी व्यक्ति को तीव्र रूप से घृणा करते हैं ,तो हम इससे संबंधित भाव को इस व्यवहार के प्रेक्षण के आधार पर नहीं जानते हैं कि हमे उसके साथ कहीं जाना पसंद नहीं है । बल्कि संबंधित भाव का ज्ञान प्रत्यक्षत: हो जाता है ।ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस उदाहरण में घृणा से संबंधित आंतरिकसंकेत स्पष्ट है।
वेब का सिद्धात का समर्थन अनौपचारिक प्रेक्षणो तथा प्रयोगात्मक शोध दोनों से होता है । अनौपचारिक प्रेक्षण को एक उदाहरण इस प्रकार दिया जा सकता है ।कभी-कभी ऐसा होता है कि व्यक्ति अपना खाना खाने बैठता है तो उसे महसूस होता है कि भूख तो नहीं है । परंतु खाना खाने लगे तो बहुत खा गए। इस उदाहरण में व्यक्ति को अपने आंतरिक अवस्था का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं था।फुल शोरूम खाना खाने जैसे स्पष्ट व्यवहार के प्रेक्षण से भूख की स्थिति को समझनेे में मदद मिली । किसलर,कोलिंस तथा मिलर ने अपने प्रयोगात्मक अध्ययन के आधार पर इस सिद्वात को समर्थन प्रदान किया है । इनके प्रयोगात्मक अध्ययन के आधार पर इस सिद्धात को प्रदान किया है। इनके प्रयोगात्मक अध्ययन के आधार पर यह देखा गया है कि जब व्यक्ति अपनी मनोवृति के अनुकूल व्यवहार करता है, तो उसे अपने इस व्यवहार में पहले से अधिक विश्वास उत्पन्न हो जाता है।
बेम के आत्म-प्रत्यक्षण सिद्धांत द्वारा आंतरिक अभिप्रेरण से संबंधित तथ्यों को समझने में काफी मदद मिली । जब व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा से मात्र आनंद प्राप्त करने के लिए करता है ,तो इस तरह के अभिप्रेरण को आंतरिक अभिप्रेरण कहा जाता है , परंतु जब व्यक्ति किसी कार्य या व्यवहार को किसी बाह्य पुरस्कार प्राप्त करने के ख्याल से करता है , तो इस तरह के अभिप्रेरण को बाह्य अभिप्रेरण कहा जाता है । बेम के अनुसार किसी व्यवहार को करने के बाद जब उसे बाह्य पुरस्कार मिलता पुरस्कार है, तो इससे इस कार्य को करने के पीछे छिपे आंतरिक अभिप्रेरण में कमी आ जाती है। इस तरह के प्रभाव को अति तार्किकरण प्रभाव कहा जाता है ,इस तरह के अतितार्किकरण प्रभाव का समर्थन डेसी तथा लीपर एवं ग्रीनी आदि के द्वारा किए गए प्रयोगों में हुआ है। इन अध्ययनों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया कि जब प्रयोज्यों को कोई ऐसा करने के लिए जिसे करने में उसे प्रारंभ में आनंद आता था । बाह्य पुरस्कार दिया गया ,तो ऐसे व्यक्ति को इन कार्यों को करने में अभिरुचि कम देखी गयी तथा उनके निष्पादन में कमी आ गयी । कुछ प्रयोगात्मक सबूतों सेयह भी पता चलता है कि इस तरह का प्रभाव उस परिस्थिति में अधिक होता है जिसके बारे में बेम का यह सिद्धांत पूर्व कथन कर चुका है अर्थात उस परिस्थिति में अधिक होता है जब किए गए कार्य से संबंधित आंतरिक संकेत अस्पष्ट होते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि बाह्य पुरस्कार देने से किए जाने वाले कार्य से आनंद प्राप्त तथा अभिरुचि में जो कमी आती है ,उसका कारण क्या है? इसकी दो व्याख्याए प्रदान की गयी है -
1.किसी व्यवहार या कार्य करने के बाद बाह्य पुरस्कार मिलने से व्यक्ति है समझने लगता है कि वह कार्य मात्र बाह्य पुरस्कार की प्राप्ति के लिए कर रहा है । फलत: उस कार्य को करने में पहले से समान आनंद या अभिरुचि नहीं रह जाता है।
2.किसी व्यवहार या कार्य करने के बाद बाह्य पुरस्कार या कार्य करने के बाद बाह्य पुरस्कार मिलने से उस कार्य से आनंद या पुरस्कार में इसलिए कमी आ जाती है क्योंकि व्यक्ति है सोचता है कि उसे कार्य करने के लिए घूस जा रहा है यह उस पर दबाव डाला जा रहा है इस तरह से व्यक्ति में एक तरह से नकारात्मक - प्रभाव उत्पन्न हो जाता है । प्रेटी तथा सेलिगमैन ने अपने अध्ययन के आधार पर इस तथ्य की संपुष्टि भी किया है।
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